जामिया मिल्लिया इस्लामिया — वह घर जहाँ हम सुरक्षित हैं
डॉ. अफ़साना इस्लाम
पीएचडी शोधार्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
पंद्रह दिन पहले मैंने अपना पीएचडी शोध-प्रबंध जमा किया। दस साल से अधिक का सफर — एक ही विश्वविद्यालय में, एक ही छात्रावास में, एक ही शहर में। उस दिन जब मैंने वह फ़ाइल जमा की, तो मेरी आँखों में आँसू थे — खुशी के, गर्व के, और उस कृतज्ञता के, जो मैं इस संस्था के प्रति हमेशा महसूस करती रही, जिसने मुझे संभाला, पढ़ाया और सुरक्षित रखा।
और फिर — उसी सप्ताह — मैंने Indian Express में एक लेख पढ़ा, जिसमें जामिया को ‘यौन उत्पीड़न की समस्याओं वाला संस्थान’ साबित करने की कोशिश की गई थी। मैंने वह लेख दो बार पढ़ा। पहली बार गुस्से से, दूसरी बार इसलिए कि शायद मैं गलत समझ रही हूँ। लेकिन नहीं — वह लेख वही कह रहा था जो मैंने पहली बार पढ़ा था। और तब मैंने निर्णय किया कि मैं चुप नहीं रहूँगी। क्योंकि जो जामिया मैंने देखा है, जो महसूस किया है, जिसमें रही हूँ — वह बताना मेरा अधिकार भी है और कर्तव्य भी। प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ के नेतृत्व में जामिया ने जो "शून्य सहिष्णुता” की नीति बनाई है, वह न केवल सही है, बल्कि हर आधुनिक शैक्षणिक संस्था के लिए एक आदर्श बननी चाहिए।
मैंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अपनी उच्च शिक्षा का सफर बीए से शुरू किया, एमए पूरा किया, और हाल ही में अपना पीएचडी शोध-प्रबंध जमा किया है। इस दौरान दस वर्षों से अधिक समय तक जामिया के माहौल, कक्षाओं, पुस्तकालयों, छात्रावासों और छात्रों के रोजमर्रा के जीवन को करीब से देखने का अवसर मिला। एक छात्रा, एक शोधार्थी, और जामिया की दस-वर्षीया साथी के नाते मैं यह महसूस करती हूँ कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया को उसकी वास्तविक तस्वीर के साथ देखा जाना चाहिए। इस दौरान मैंने जामिया को कई कुलपतियों के साथ देखा है। और मैं जिम्मेदारी के साथ कहती हूँ कि वर्तमान प्रशासन — प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ और प्रोफेसर मेहताब आलम रिज़वी के नेतृत्व में — ने महिला छात्राओं की सुरक्षा के लिए जो कदम उठाए हैं, वे पहले कभी नहीं देखे थे। यह मेरी राय नहीं, मेरा अवलोकन है। यह एक ऐसा संस्थान है जो अपनी समस्याओं को छुपाने के बजाय उनका सामना करने की कोशिश कर रहा है, जहाँ महिलाओं की सुरक्षा को गंभीरता से लिया जा रहा है, और जहाँ पारदर्शिता को संस्थागत शक्ति के रूप में अपनाया जा रहा है।
New Indian Express ने लिखा कि ‘जामिया में तीन वर्षों में 24 शिकायतें’। और बस। शीर्षक लगा दिया, खबर छाप दी, काम हो गया। लेकिन एक क्षण के लिए रुकें और सोचें: कोई छात्रा शिकायत कब दर्ज करती है? जब उसे यकीन हो कि उसकी बात सुनी जाएगी। जब उसे डर न हो कि उसे ही दोषी ठहराया जाएगा। जब उसे पता हो कि व्यवस्था उसके साथ है, उसके विरुद्ध नहीं। मैंने अपने इन दस वर्षों में ऐसे संस्थान भी देखे हैं जहाँ कोई शिकायत नहीं आती — इसलिए नहीं कि कुछ होता नहीं, बल्कि इसलिए कि छात्राओं को पता है कि शिकायत करने का कोई फायदा नहीं। वहाँ खामोशी है — लेकिन वह खामोशी बेबसी की है, सुकून की नहीं। जामिया में अगर शिकायतें दर्ज हो रही हैं — तो इसका मतलब है कि छात्राओं को विश्वास है। वे जानती हैं कि ICC का दरवाजा खुला है, फ़ोन नंबर उपलब्ध है, ऑनलाइन पोर्टल मौजूद है, और सबसे बढ़कर — कार्रवाई होगी। जिस संस्थान में कोई शिकायत न हो — वहाँ ज़रूरी नहीं कि सब ठीक हो। हो सकता है कि छात्राओं को आवाज़ उठाने की हिम्मत ही न हो। शिकायत दर्ज होना व्यवस्था की विफलता नहीं, छात्राओं के साहस और व्यवस्था के प्रति विश्वास की सफलता है।
सबसे पहले तथ्यों को समझते हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 22,000 से अधिक छात्र-छात्राएँ पंजीकृत हैं। 2025 में 11 शिकायतें आई हैं और यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सभी शिकायतें पूरी हो चुकी हैं और हर एक पर त्वरित कार्रवाई की गई है। अब अगर हम JNU को देखें तो वहाँ केवल 8,800 से 9,000 छात्र हैं, लेकिन फिर भी 26 शिकायतें दर्ज हुई हैं। प्रति व्यक्ति दर से देखें तो जामिया में दर JNU से कहीं कम है। लेकिन Indian Express का नकारात्मक शीर्षक जामिया के बारे में है, JNU के बारे में नहीं। यह उचित नहीं है। यह विचार करने योग्य बात है कि ऐसे पूर्वाग्रह के पीछे क्या उद्देश्य है? मैं इस प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ती हूँ — पाठक स्वयं निष्कर्ष निकालें।
मैं प्रशासनिक दस्तावेज़ों या सरकारी बयानों की बात नहीं कर रही। मैं वह बता रही हूँ जो मैंने अपने दस वर्षों में देखा, महसूस किया, और जिया है। इस प्रशासन के आने के बाद परिसर में सुरक्षा का स्तर बिल्कुल बदल गया। कोई भी असंबंधित व्यक्ति अब अंदर नहीं आ सकता। परिसर में कैमरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रात को गश्त होती है। प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मुहम्मद मेहताब आलम रिज़वी ने जब अपनी जिम्मेदारी संभाली, तो उन्होंने छात्रों की सुरक्षा और कल्याण के लिए एक स्पष्ट, तार्किक और व्यावहारिक योजना बनाई। और सबसे बड़ी बात — जब कोई घटना हुई, तो कुलपति स्वयं रात को परिसर आए। स्वयं आए — कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा, कोई बयान जारी नहीं किया — स्वयं आकर देखा कि छात्राएँ सुरक्षित हैं। यह एक छोटी सी बात लगती है, लेकिन छात्रावास में रहने वाली एक लड़की के लिए यह बहुत बड़ा संदेश होता है: कि हमारा नेतृत्व हमें केवल कागजों पर नहीं, व्यावहारिक रूप से भी महत्वपूर्ण समझता है।
मैं अपने सभी वर्षों में जामिया में जो भी प्रशासन देखा है, उस वर्तमान प्रशासन से बेहतर कोई नहीं है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए, अनेक जागरूकता अभियान चलाए, यौन उत्पीड़न के विरुद्ध सेमिनार आयोजित किए, और सबसे महत्वपूर्ण — जामिया की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को अधिक सक्रिय और सुलभ बनाया गया। छात्र अब फ़ोन, ईमेल, ऑनलाइन पोर्टल और प्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकते हैं। शिकायतकर्ता को अपनी पहचान की सुरक्षा और गोपनीयता का आश्वासन दिया जाता है, और निर्धारित समय-सीमा के भीतर जाँच पूरी करने का प्रयास किया जाता है।
जामिया में रोकथाम की शिक्षा और जागरूकता की रणनीति भी बहुत मजबूत है। जामिया के विभिन्न संकायों और विभागों में नियमित रूप से यौन जागरूकता से संबंधित सेमिनार, नुक्कड़ नाटक, और जागरूकता अभियान आयोजित करना अनिवार्य है। इनमें से कोई भी महज औपचारिक नहीं है। हर सेमिनार छात्रों को स्वीकार्य सीमाओं के बारे में सिखाता है। सरोजिनी नायडू महिला अध्ययन केंद्र (SNCWS) महिलाओं के मुद्दों की वकालत, शोध और सुधार पर काम करता है। यह केंद्र महिलाओं के अधिकारों, ऑनलाइन उत्पीड़न से लड़ने, और यौन हिंसा से बचाव जैसे विषयों पर कार्यशालाएँ आयोजित करता है। जामिया में मनोवैज्ञानिक सहायता और परामर्श की सुविधाएँ भी मौजूद हैं, जो उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं जो किसी भी प्रकार के मानसिक दबाव या उत्पीड़न के अनुभवों से गुज़र रहे हों।
कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मेहताब आलम रिज़वी के नेतृत्व में जामिया ने पिछले डेढ़ वर्षों में न केवल शैक्षणिक रैंकिंग, शोध गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय पहचान के क्षेत्र में प्रगति की है, बल्कि एक अधिक सुरक्षित और जवाबदेह परिसर-संस्कृति की स्थापना का भी प्रयास किया है। यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि सभी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। दुनिया का कोई भी विश्वविद्यालय ऐसा दावा नहीं कर सकता। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि समस्याओं से निपटने की गंभीरता, संस्थागत प्रतिक्रिया की गति, और पारदर्शिता के संदर्भ में जामिया ने एक सकारात्मक दिशा अपनाई है।
मैंने इस लेख को लिखने से पहले जामिया की कम से कम 200 छात्राओं से बात की। हर एक ने प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ के नेतृत्व से अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। सभी ने बताया कि इस प्रशासन ने सभी महिला छात्राओं की सुरक्षा और संरक्षा के लिए जो कदम उठाए हैं, वे बहुत प्रभावी और वास्तविक हैं। सभी छात्राओं ने कहा कि वे अब अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं और उन्हें कभी कोई भय या गंभीर समस्या महसूस नहीं हुई।
मैं तीन छात्राओं की प्रत्यक्ष गवाही शामिल कर रही हूँ जो विभिन्न विभागों से हैं। उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनके नाम बदल दिए हैं। शिक्षा विभाग से एमए कर रही एक छात्रा आयशा ने कहा, "मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि इस जामिया में मेरी सुरक्षा के लिए सब कुछ मौजूद है। कुलपति और रजिस्ट्रार साहब ने जो सुरक्षा के कदम उठाए हैं, मैंने सब अपनी आँखों से देखे हैं। कैमरे हर जगह हैं, सुरक्षा बहुत कड़ी है, और अगर कोई समस्या हो तो ICC हमेशा मदद के लिए मौजूद है। मैं अपनी माँ को भी बताती हूँ कि जामिया में मैं बिल्कुल सुरक्षित हूँ।” विज्ञान संकाय की एक छात्रा ज़ैनब ने कहा कि "उन्होंने जामिया के विभिन्न कालखंड देखे हैं और वर्तमान दौर में शिकायतों के निवारण की व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार महसूस किया है। उनके अनुसार अब छात्रों को यह विश्वास है कि अगर वे किसी समस्या की ओर इशारा करें तो प्रशासन गंभीरता से उसका संज्ञान लेगा।” मानविकी की एक शोधार्थी उम्मे हानी ने इस बात पर जोर दिया कि "इस प्रशासन ने वास्तविक बदलाव लाया है। पहले शायद कुछ चीजें छिपी रहती थीं या कहीं खो जाती थीं। अब सब कुछ स्पष्ट है। हर एक शिकायत को सुना जाता है। हर एक मामले पर सावधानीपूर्वक कार्रवाई होती है। मैं अपनी बहन को भी जामिया में दाखिला लेने के लिए कह रही हूँ क्योंकि मुझे यकीन है कि वह यहाँ बिल्कुल सुरक्षित रहेगी।”
इन विचारों को महज भावनात्मक बयान कहना आसान है, लेकिन इनके पीछे वे रोजमर्रा के अनुभव हैं जो किसी भी संस्थान की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए न केवल प्रशासनिक कदम ही उठाए हैं, बल्कि जागरूकता और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है। विभिन्न विभागों में नियमित रूप से सेमिनार, कार्यशालाएँ, जागरूकता अभियान और संवाद-सत्रों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल कानूनों के बारे में जागरूकता देना नहीं, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहाँ परस्पर सम्मान, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को बढ़ावा मिले।
मैं यहाँ किसी की प्रशंसा नहीं कर रही — मैं वह बता रही हूँ जो देखा है। प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ और प्रोफेसर मेहताब आलम रिज़वी के आने के बाद जामिया में जो परिवर्तन आए, उनमें से बहुत सारी बातें उल्लेखनीय हैं। मैं जानती हूँ कि कुछ लोग इस लेख को भी ‘प्रचार’ कहेंगे। कहेंगे कि यह संस्थान का बचाव है। लेकिन मैं सोचती हूँ: एक पीएचडी शोधार्थी जो दस साल से उस छात्रावास में रही हो, जिसने इस संस्थान में बचपन से जवानी तक का सफर किया हो, जो इस जगह की हर गली, हर पेड़, हर कमरे को जानती हो — जब वह कहे कि ‘यह जगह सुरक्षित है’ — तो उसकी बात का महत्व क्या होना चाहिए? क्या उससे अधिक महत्व उस व्यक्ति की बात का होना चाहिए जिसने बाहर से बैठकर आँकड़ों को एक खास तरीके से व्यवस्थित करके एक लेख लिखा?
मैं कहती हूँ: जामिया मिल्लिया इस्लामिया मेरा घर है। इस घर में मुझे कभी डर नहीं लगा। इस घर में मैंने पढ़ा, सीखा, बड़ी हुई, और डॉक्टर बनी। इस घर के दरवाजे हर उस छात्रा के लिए खुले हैं जो पढ़ना चाहती है, और इस घर की दीवारें हर उस छात्रा को सुरक्षित रखती हैं जो यहाँ रहती है। यह मेरी गवाही है। यह दस वर्षों का अनुभव है। और यह किसी अखबार की सुर्खी से खंडित नहीं होता। जामिया मिल्लिया इस्लामिया: भारत में महिला सुरक्षा का एक उज्ज्वल आदर्श बन रहा है।
— डॉ. अफ़साना इस्लाम, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

